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Unsung Heroes Detail

Paying tribute to India’s freedom fighters

राजा मर्दन सिंह

Ashoknagar, Madhya Pradesh

August 31, 2022 to August 31, 2023

मर्दन सिंह का जन्म 1799 ई. में हुआ था। इनके पिता मोद प्रहलाद बुन्देलखण्ड की चन्देरी रियासत के राजा थे। मर्दन सिंह की माता का नाम राजकुँवर था। 1811 ई. में ग्वालियर सिंधिया ने चन्देरी पर आक्रमण कर उस पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। 1830 ई. में मोद प्रहलाद ने बानपुर को अपनी राजधानी बनाया। बानपुर ललितपुर जिले में है। मगर मर्दन सिंह का जन्म स्थान एवं कर्मक्षेत्र अधिकांशतः मध्यप्रदेश रहा। सागर के पास मालथौन एवं नरयावली में मर्दन सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किए। उन्होंने शाहगढ के राजा बखतवली का सहयोग किया। 1842 इ्र्र. में मोद प्रहलाद की मृत्यु उपरान्त मर्दन सिंह बानपुर के राजा बने। मर्दन सिंह ने बखतवली के सहयोग से चन्देरी में सिंधिया के प्रतिनिधि जसवंतराय से चन्देरी प्राप्त कर लिया। क्रांतिकारियों के भय से 370 अंग्रेजों (173 पुरूष, 63 महिलाएं एवं 134 बच्चे) को शनिवार 27 जून, 1857 को सागर के किले में शरण लेनी पडी। शहगढ़ राजा बखतवली ने 20 जुलाई, 1857 को मर्दन सिंह को पत्र भेज कर अंग्रेजों पर आक्रमण हेतु सागर बुलाया।किले की चारों दिशाओं में क्रमशः बखतवली, उनके सेनापति बोधन दौआ, बानपुर राजा मर्दन सिंह एवं गढी अम्बा पानी के नवाब बन्धुओं ने घेर लिया। नरयावली के युद्ध में 17 सितम्बर, 1857 को मर्दन सिंह ने एक युद्ध में ब्रिटिश सेना को करारी शिकस्त दी। ब्रिटिश सरकार ने अंग्रेजों को मुक्त कराने उस समय के सबसे बहादुर सेनापति ब्र्रिगे्रडियर जनरल ह्रयूरोज को भेजा। इन क्रांतिकारियों ने बुंदेलखंड के पश्चिमी प्रवेश द्वार राहत के किले में ह्रयूरोज की विशाल सेना को रोकने हेतु मोर्चावन्दी की गद्दारों की सूचना के कारण ह्रयूरोज ने राहतगढ पर अधिकार कर लिया। 3 फरवरी, 1858 को पूरे 222 दिन पश्चात सागर के किले से अंग्रेजों को मुक्त करा लिया। इसके पश्चात ह्रयूरोज रानी लक्ष्मीबाई का सामना करके झाँसी की ओर बढा।रानी लक्ष्मीबाई मर्दन सिंह की काफी इज्जत करती थीं। एवं सदैव पत्र द्वारा उनसे परामर्श लेती थीं। मर्दन सिंह एवं बखतवली भी रानी लक्ष्मीबाई के सहयोग हेतु तत्पर रहते थे। बखतवली एवं मर्दन सिंह ने ह्रयूरोज को झाँसी जाने से रोकने के लिए क्रमशः मदनपुर घाटी एवं नाराहट घाटी में मोर्चाबन्दी की। गद्दारों की सूचना के चलते ह्रयूरोज इस मोर्चे को तोड कर झाँसी रवाना हो गया। ह्रयूरोज ने मेजर ओर को यह दायित्व सौंपा कि वह बखतवली एवं मर्दन सिंह को रानी लक्ष्मीबाई की सहायता हेतु कालपी आने से रोके। ओर इसमें सफल रहा। ग्वालियर में अंग्रेजों से संघर्ष करते-करते रानी लक्ष्मीबाई 17 जून, 1857 को वीर गति को प्राप्त हुई। इसके बाद क्रमशः 5 एवं 6 जुलाई 1858 को मर्दन सिंह एवं बखतवली ने शाहगढ के असिस्टेण्ट सुपरिटेण्डेन्ट मिस्टर थरेण्टन के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया। इन दोनों राजाओं को लाहौर ले जाकर हकीम राय की हवेली में नजरबन्द रखा गया। बाद में बखतवली को मथुरा आने की अनुमति मिली। मथुरा में 22 जुलाई, 1879 को मर्दन सिंह का देहान्त हो गया।

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